Monday, July 30, 2007

तुम...!

तुम जो भी हो, जहाँ भी हो, पर हो कहीँ ।।
तुम्हें मैं जानती नही पर इतना तो ज़रूर जानती हूँ,
कि तुम्हें खास मेरेलिये ही बनायागाया है ।।
पर जब तुम मिलोगे तो तुमसे बोहत सरे करनी है
शिकायतें और बातें, यादें ताज़ा करने हैं ।
अरे यार कबसे में तुम्हारी इंतज़ार कर रही हूँ,तक चुकी हूँ में ।
तुम्हें देखने को जीं चाहता है, मन तरसता है तुम्हे चूने को,
तुम्हे पास महसूस करने को, तुम्हे अपना बनाने को ।।
इतना प्यार चाहिऐ मुजे तुमसे, कि इस दुनिया को ही भूलादुं ।
और इसका इंतजार रहेगा मुजे, हमेशा हमेशा के लिए ।।
में बेचैन हो रही हूँ, अक्सर तुम्हारी यादों में ।
पूज्थी हूँ कि वो दिन धोद्के आये जब तुम अपना
चेहरा मुजे दिक्लाओगे और कहोगे कि...
तुम मेरी हो, और में तुम्हारा हूँ,
हमेशा हमेशा के लिए, ये मेरा वादा रहा ।।
Di
19th Dec 2005

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